ग्राम पंचायत : गाँव की अपनी सरकार

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ग्राम पंचायत : गाँव की अपनी सरकार

  जी हाँ, आपके गाँव की पंचायत स्थानीय स्तर पर आपकी अपनी सरकार है। भारतीय संविधान के अनुसार यह स्व-सरकार (Self-Government) है जिससे गाँव की व्य

 

जी हाँ, आपके गाँव की पंचायत स्थानीय स्तर पर आपकी अपनी सरकार है। भारतीय संविधान के अनुसार यह स्व-सरकार (Self-Government) है जिससे गाँव की व्यवस्था और विकास में लोगों की प्रभावी व पूरी सहभागिता तय होती है।

ग्राम पंचायत को ठीक से समझने के लिए हमें पहले `सरकार’ होने का मतलब क्या होता है, इसे ठीक से समझना होगा। जब दुनिया में राजतंत्र था तब राजा का राज होता था। राजा अपने राजकाज (शासन) को चलाने के लिए कुछ संस्थाएं तथा विभाग बनाता था और उसमें सदस्य तथा कर्मचारी नियुक्त करता था। लेकिन जब लोकतन्त्र आया तो जनता का राज हुआ। जनता का राज कैसे चले इसके लिए सभी देशों में संविधान बनाया गया। इस संविधान में भी राजकाज (शासन) चलाने के लिए कुछ संस्थाएं और विभाग बनाने की व्यवस्था की गयी।

यदि इसे और अधिक सरलता से समझना चाहें तो हमें कल्पना करना होगा कि कोई भी कार्य करने के लिए हमें क्या-क्या करना होता है? उसकी क्या प्रक्रिया होती है? मान लीजिये हमें अपने बच्चे का स्कूल में एडमिशन कराना है तो हम क्या करेंगे ! स्वाभाविक है कि पहले हम यह सोचेंगे ‘विचार’ करेंगे कि किस क्लास में कराएं, किस स्कूल में कराएं, कौन सा विषय हो, आदि आदि। इसमें यह विचार भी करेंगे कि किस स्कूल में कितना खर्च आयेगा और हमारे पास उसकी व्यवस्था है या नहीं आदि। पूरा विचार करने के बाद तब हम आवश्यकता, सुविधा और अपनी सामर्थ्य के अनुसार ‘निर्णय’ लेंगे कि बच्चे को इस स्कूल में भर्ती कराना है। उसके बाद बच्चे को ले जाकर उस स्कूल में भर्ती कराने का `कार्य’ करेंगे।

इस प्रकार हमने पहले ‘सोचा’ और विचार किया, फिर उसके अनुसार ‘निर्णय’ लिया और फिर निर्णय के अनुसार उसे ‘क्रियान्वित’ किया। ठीक इसी प्रकार गाँव, ब्लॉक, जिला, प्रदेश व देश, सबके कामकाज व व्यवस्था के लिए इन्ही तीनों (विचार, निर्णय और क्रिया) की प्रक्रिया से गुजरना होता है।

व्यक्तिगत या पारिवारिक दायरे में यह कार्य खुद अथवा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर आसानी से हो जाता है लेकिन गाँव, ब्लॉक, जिला, राज्य व देश के स्तर पर इस कार्य के लिए एक सामूहिक प्रयास की जरूरत होती है जिसके लिए संस्थाओं का गठन किया जाता है। राजतंत्र में यह तीनों कार्य सामान्यतः राजा करता था लेकिन लोकतन्त्र में यह तीनों कार्य जनता को करना होता है। जनता अर्थात गाँव समाज के लोग यह कार्य या तो स्वयं करें या फिर अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से करें। यह इस पर तय होता है कि वे लोग कहाँ और कितनी उपस्थिति या भागीदारी, प्रत्यक्ष रूप से स्वयं या अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिनिधियों के माध्यम से दे सकते हैं।

सरकार के मायने

इस राजकाज (शासन) को चलाने वाले को ही सरकार कहते है। लोकतन्त्र में यह कार्य गाँव से लेकर देश स्तर तक व्यक्ति द्वारा नहीं संस्था या संगठन द्वारा पूरा किया जाता है। जैसा कि हमने देखा कि किसी कार्य के लिए विचार, निर्णय और क्रिया के स्तर से गुजरना होता है। अतः इसके लिए आवश्यकता और परिस्थिति के हिसाब से एक या एक से अधिक संस्थाओं की जरूरत पड़ती है।

उदाहरण के रूप में यदि हम देखें तो देश के स्तर पर व्यवस्था की इन तीन जरूरतों के लिए एक से अधिक संस्था बनाई गई है। विचार व निर्णय के लिए `संसद’ (पार्लियामेंट) है और उस निर्णय को क्रियान्वित करने के लिए `मंत्रिमंडल’ है। वहाँ एक और संस्था भी है जो देश की व्यवस्था के लिए बनाए गए नियम व कानून के अनुसार काम न करने वालों को दंडित करने या पीड़ित को न्याय देने के लिए है जिसे `सुप्रीम कोर्ट’ कहा जाता है। संविधान के शब्दों में पहले को `विधायिका’, दूसरे को ‘कार्यपालिका और तीसरे को `न्यायपालिका’ कहा गया है। यही तीनों संस्थायें देश की जो सरकार है उसके मुख्य अंग हैं।

यदि इस फार्मूले पर राज्य सरकार को देखें तो उसके भी तीन अंग है- विधायिका –विधानसभा है, कार्यपालिका – राज्य का मंत्रिमंडल तथा न्यायपालिका – हाईकोर्ट है।

अब अगर ‘गाँव सरकार’ अर्थात `पंचायत सरकार’ को देखें तो इसकी विधायिका – ग्रामसभा है, कार्यपालिका – ग्राम पंचायत है तथा न्यायपालिका – न्याय पंचायत है। इस प्रकार आपके गाँव की पंचायत व्यवस्था, गाँव की सरकार है।

गाँव के ‘स्व-सरकार’ के रूप में संविधान ने तो इसे मान्यता दे दी है लेकिन अभी व्यवहार में यह धरातल पर उतर नहीं पाई है। क्योंकि इसके लिए जिस स्तर और रूप में प्रयास की आवश्यकता है वह अभी उस तरह से नहीं हो पाया है।

यह सही अर्थों में गाँव की सरकार के रूप में कार्य करने लगे, इसके लिए ग्राम पंचायत सदस्यों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। लेकिन यह तभी सम्भव है जब सदस्यगण इस पंचायत व्यवस्था और उसके संवैधानिक एवं अधिनियमगत नियमों और कानूनों को ठीक से समझें तथा उसके आधार पर अपनी सक्रिय व प्रभावी भूमिका सुनिश्चित करें।

गांधी जी ने जिस `ग्राम स्वराज्य’ का सपना देखा था उसके लिए पंचायत को ही आधार बनाया था। उनकी दृष्टि में स्वराज्य का अर्थ लोक सम्मति के अनुसार चलने वाला `शासन’ था और इस लोक सम्मति का मंच पंचायत थी। वे ग्राम स्वराज्य को इसी अर्थ में पूर्ण प्रजातन्त्र के रूप में देखते थे। इसी नाते ग्राम का शासन पंचायत का शासन था। इसी अर्थ में उस समय भी पंचायत गाँव की सरकार के रूप में पहचानी गई थी। यही स्वराज्य का मूल आधार बनती थी।

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