लेखक- डॉ. चन्द्रशेखर प्राण सामूहिक कार्य एवं व्यवस्था के लिये संस्थाएँ बनाई जाती हैं। लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में संस्थाएँ ही सरकार के रूप में क
लेखक- डॉ. चन्द्रशेखर प्राण
सामूहिक कार्य एवं व्यवस्था के लिये संस्थाएँ बनाई जाती हैं। लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में संस्थाएँ ही सरकार के रूप में कार्य करती हैं। संस्थाएँ सदस्यों से बनती हैं। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी तरह की संवैधानिक संस्थाओं और उनके सदस्यों पर टिकी है। गाँव से लेकर देश के स्तर तक इन संस्थाओं को बनाने की ज़िम्मेदारी जनता को सौंपी गई है।
देश की पहली दो सरकारों (संघ और राज्य सरकार) को बनाने और चलाने के लिये देश का नागरिक अपने प्रतिनिधियों को चुनता है, अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से सहभागी बनता है। तीसरी सरकार (पंचायत एवं नगर पालिका), जिसे संविधान ने स्व-सरकार के रूप में मान्यता दी है, में वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों तरह से सहभागिता करता है।
पंचायत, जन सामान्य के सबसे निकट की व्यवस्था है। सही मायने में यह स्वतन्त्रता, स्व-शासन एवं स्वराज्य का मूल आधार है। इसमें देश के नागरिकों को सरकार बनाने का ही नहीं, चलाने का भी अवसर मिलता है।
सहभागी लोकतन्त्र और सुशासन के आधारभूत मापदंड- पारदर्शिता, सहभागिता और जवाबदेही की दृष्टि से पंचायत व्यवस्था सबसे ज्यादा अनुकूल और सहज है। किन्तु संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान के बावजूद, देश के ज्यादातर गाँवों में यह व्यवस्था अभी तक सही तरीके से व्यवहार में नहीं उतर पाई है। इसके संवैधानिक प्रावधानों का सही तरीके और प्रक्रिया के अनुसार अनुपालन नहीं हो रहा है।
पंचायत व्यवस्था के अन्तर्गत एक ग्राम पंचायत क्षेत्र को जनसंख्या के आधार पर अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है। जिसे वार्ड कहा जाता है।
प्रत्येक वार्ड में सम्बन्धित मतदाताओं द्वारा ग्राम पंचायत सदस्य का चुनाव होता है। सही अर्थों में ग्राम पंचायत क्षेत्र के वार्ड से चुने जाने वाले यही सदस्य आधारभूत स्तर के प्रथम जन प्रतिनिधि और पंचायती राज व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
वर्तमान में ग्राम पंचायत एक संवैधानिक संस्था है। संविधान के अनुच्छेद 243ग (2) के अनुसार तीनों स्तरों की पंचायतों (ग्राम पंचायत, मध्यवर्ती पंचायत तथा जिला पंचायत) का गठन, उसके चुने हुए सदस्यों से होता है। इसलिए उसकी सफलता और विकास में सदस्यों की भूमिका ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
ग्राम पंचायत सदस्य भी उसी ‘जन’ (नागरिक) के प्रतिनिधि हैं, जो संवैधानिक रूप से इस देश का मालिक है। ग्राम पंचायत का सदस्य आधारभूत स्तर पर `जन-प्रतिनिधि’ होता है। सम्बन्धित वार्ड सभा का अध्यक्ष होता है।
ग्राम पंचायत की स्थायी समितियों का सदस्य एवं सभापति भी होता है। ग्राम पंचायत विकास योजना, जो पंचायत को सही अर्थों में सरकार के रूप में प्रतिष्ठित करती है, उसमें वार्ड से लेकर ग्राम सभा तक, ग्राम पंचायत सदस्यों की भूमिका ही प्रमुख है।
यदि पंचायत व्यवस्था को सही मायने में व्यावहारिक धरातल पर उतारना है, तो पंचायतों के संस्थागत विकास और सदस्यों की सक्रिय एवं प्रभावी भूमिका को प्राथमिकता पर रखना होगा। ग्राम पंचायत सदस्य ही अपनी पहल, रचनात्मक कार्य व व्यवहार से नागरिकों को जागरूक कर सकता है।
उनमें पंचायत व्यवस्था के प्रति लगाव व स्वामित्व का भाव पैदा कर सकता है। उसे ही नेतृत्व की इकाई बन, गाँव की जड़ता और शून्यता को समाप्त करना होगा। ‘लोगों’ को ‘नागरिक’ के रूप में तैयार करना होगा। इसी से आगे का वह रास्ता शुरू होगा, जो गाँव को स्वशासन, स्वावलम्बन और खुशहाली के दरवाजे तक पहुँचायेगा।

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