बदलती ग्रामीण रोजगार नीति

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बदलती ग्रामीण रोजगार नीति

लेखक- रमेश ग्रामीण रोजगार का सामाजिक आधार भारत में ग्रामीण रोजगार नीति लंबे समय से सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार रही है। आज भी बड़ी ग्रामीण

लेखक- रमेश

ग्रामीण रोजगार का सामाजिक आधार

भारत में ग्रामीण रोजगार नीति लंबे समय से सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार रही है। आज भी बड़ी ग्रामीण आबादी कृषि और असंगठित श्रम पर निर्भर है। ऐसे में रोजगार योजनाएं केवल मजदूरी का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिरता का माध्यम भी हैं।

मनरेगा ने बदली ग्रामीण रोजगार की तस्वीर

वर्ष 2005 में लागू महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ने ग्रामीण परिवारों को रोजगार का कानूनी अधिकार दिया। इस योजना के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को साल में निश्चित दिनों तक मजदूरी आधारित काम उपलब्ध कराने का प्रावधान था। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता रही।

करीब दो दशकों तक यह योजना ग्रामीण भारत के लिए आर्थिक सहारा बनी रही। सूखा, बाढ़, महामारी और आर्थिक संकट के समय इसने लाखों परिवारों को आय का स्रोत दिया। गांवों में सड़क, तालाब, नहर, जल संरक्षण और ग्रामीण ढांचे से जुड़े अनेक कार्य हुए। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार भी बढ़ा और आधारभूत सुविधाओं में सुधार भी हुआ।

महिलाओं और कमजोर वर्गों को मिला सहारा

इस योजना का सामाजिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण रहा। महिलाओं, दलितों और आदिवासी समुदायों की भागीदारी बढ़ी। महिलाओं को गांव में ही मजदूरी मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। कई राज्यों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर पहुंच गई। इससे परिवारों की आय और सामाजिक स्थिति दोनों में सुधार हुआ।

महामारी के दौर में बड़ी राहत

कोविड-19 महामारी के दौरान ग्रामीण रोजगार योजना की अहमियत और स्पष्ट हुई। शहरों से लौटे लाखों प्रवासी मजदूरों को गांवों में काम मिला। इससे ग्रामीण बाजारों में मांग बनी रही और स्थानीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप होने से बच गई। कई अर्थशास्त्रियों ने माना कि इस योजना ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने में बड़ी भूमिका निभाई।

नई योजना के साथ नई दिशा

अब केंद्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बदलाव करते हुए “विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण)” यानी वीबी-ग्राम योजना लागू की है। सरकार का कहना है कि नई योजना केवल मजदूरी आधारित कार्यक्रम नहीं होगी, बल्कि इसे ग्रामीण विकास और आजीविका सुधार से जोड़ा जाएगा।

नई योजना में रोजगार अवधि 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है। सरकार इसे बड़ा सुधार बता रही है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल दिनों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जरूरत के समय लोगों को वास्तव में काम मिले।

अधिकार आधारित व्यवस्था में बदलाव

पुरानी व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका मांग आधारित स्वरूप था। ग्रामीण परिवार स्वयं काम मांग सकते थे और सरकार पर रोजगार उपलब्ध कराने की कानूनी जिम्मेदारी थी। समय पर काम नहीं मिलने पर बेरोजगारी भत्ता देने का भी प्रावधान था। इसी कारण इसे अधिकार आधारित कानून माना जाता था।

नई व्यवस्था में यह स्वरूप कुछ बदलता दिखाई दे रहा है। अब रोजगार योजनाएं तय बजट और स्वीकृत परियोजनाओं के आधार पर संचालित होंगी। कई विशेषज्ञ इसे अधिकार आधारित मॉडल से कल्याणकारी मॉडल की ओर बदलाव मानते हैं। उनका कहना है कि इससे रोजगार की कानूनी गारंटी कमजोर हो सकती है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मौजूदा चुनौती

ग्रामीण भारत में रोजगार की स्थिति आज भी पूरी तरह स्थिर नहीं है। कृषि पर निर्भर आबादी बड़ी है, लेकिन खेती से आय सीमित है। छोटे और सीमांत किसान अतिरिक्त मजदूरी पर निर्भर रहते हैं। भूमिहीन मजदूरों के लिए सार्वजनिक रोजगार योजनाएं आज भी सुरक्षा कवच का काम करती हैं।

डिजिटल तकनीक पर बढ़ता जोर

नई योजना में डिजिटल तकनीक को प्रमुख स्थान दिया गया है। बायोमेट्रिक उपस्थिति, मोबाइल आधारित निगरानी और जीपीएस ट्रैकिंग जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा रही हैं। सरकार का दावा है कि इससे भ्रष्टाचार कम होगा और पारदर्शिता बढ़ेगी। मजदूरी सीधे बैंक खातों में भेजी जाएगी और कार्यों की निगरानी आसान होगी।

हालांकि डिजिटल व्यवस्था को लेकर चिंताएं भी सामने आ रही हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और नेटवर्क की समस्या बनी हुई है। बड़ी संख्या में मजदूरों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं। तकनीकी गड़बड़ी होने पर मजदूरी भुगतान में देरी हो सकती है। इसका असर गरीब परिवारों पर सीधे पड़ेगा।

पंचायतों के सामने प्रशासनिक चुनौती

नई योजना में ग्राम पंचायतों को “विकसित ग्राम पंचायत योजना” तैयार करनी होगी। इन्हें जिला और राज्य स्तर की योजनाओं से जोड़ा जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे योजनाओं में बेहतर समन्वय होगा और विकास कार्य अधिक प्रभावी बनेंगे।

लेकिन पंचायतों की प्रशासनिक क्षमता भी एक बड़ी चुनौती है। कई पंचायतों में तकनीकी स्टाफ की कमी है। डिजिटल प्रशिक्षण सीमित है। ऐसे में आशंका है कि कई स्थानों पर योजनाएं कागजी प्रक्रिया तक सीमित रह सकती हैं।

राज्यों पर बढ़ सकता है आर्थिक दबाव

नई व्यवस्था में राज्यों की आर्थिक भागीदारी भी बढ़ाई गई है। पहले मजदूरी खर्च का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार वहन करती थी। अब राज्यों को अधिक आर्थिक योगदान देना होगा। आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों के लिए यह चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं हुआ तो रोजगार कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

इस बदलाव ने संघीय ढांचे पर भी बहस शुरू कर दी है। कुछ राज्य सरकारों का कहना है कि केंद्र ने वित्तीय बोझ राज्यों पर बढ़ा दिया है। विपक्षी दलों ने भी गरीब राज्यों पर अतिरिक्त दबाव की आशंका जताई है। वहीं सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था अधिक जवाबदेह और परिणाम आधारित होगी।

जलवायु और विकास पर फोकस

नई योजना में जल संरक्षण, सिंचाई, ग्रामीण सड़क और जलवायु अनुकूल परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है। दीर्घकालिक दृष्टि से यह ग्रामीण उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर सकता है। जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण बेहद जरूरी माना जा रहा है।

हालांकि रोजगार के मौसमी स्वरूप को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में कृषि सीजन के दौरान सार्वजनिक कार्य सीमित किए जा सकते हैं। सरकार का तर्क है कि इससे खेती के लिए मजदूर उपलब्ध रहेंगे। लेकिन भूमिहीन मजदूरों के लिए यह स्थिति कठिन हो सकती है।

भविष्य की सफलता क्रियान्वयन पर निर्भर

नई योजना का भविष्य उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। यदि पर्याप्त बजट, मजबूत स्थानीय ढांचा और पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित हुई तो यह ग्रामीण विकास को नई दिशा दे सकती है। लेकिन यदि रोजगार की कानूनी गारंटी कमजोर हुई तो गरीब परिवारों की आर्थिक सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

विकास और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन जरूरी

भारत जैसे विशाल देश में ग्रामीण रोजगार केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्थिरता का आधार है। इसलिए रोजगार नीति बनाते समय विकास और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

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