73वाँ संविधान संशोधन : खास-खास बातें

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73वाँ संविधान संशोधन : खास-खास बातें

73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती राज व्यवस्था का जो स्वरूप निर्धारित किया गया, उसे नए पंचायती राज के रूप में पूरे देश में प्रसारित-प्रचारित क

73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती राज व्यवस्था का जो स्वरूप निर्धारित किया गया, उसे नए पंचायती राज के रूप में पूरे देश में प्रसारित-प्रचारित किया गया। निर्धारित समयावधि के भीतर अधिकांश राज्यों ने अपने-अपने अधिनियमों में संशोधन किये और नये पंचायती राज की विधिवत् घोषणा की। यह संविधान संशोधन भारतीय इतिहास में एक क्रांतिकारी घटना के रूप में चिह्नित किया गया है। सच्चा लोकतंत्र और असली आजादी के सपनों के साथ पिरोकर इस प्रयास का ताना-बाना बुना जा रहा है। अब तो धीरे-धीरे एक लम्बा अर्सा बीत चुका है इसको लागू हुए।

जैसा कि सर्वविदित है कि संविधान के अनुच्छेद 40 (नीति निर्देशक सिद्धान्त) में कहा गया है; राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठायेगा और उनको ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त सरकार (Self Government) की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों। लेकिन यह नीति निर्देशक वाक्य राज्य सरकारों के लिए सिर्फ सलाह का विषय बनकर रह गया था। उनके लिए बाध्यता नहीं थी। 73वें संविधान संशोधन ने एक सीमा तक उन्हें इसके लिए बाध्य कर दिया है। पंचायतों को अब संवैधानिक दर्जा मिल गया है। संविधान के भाग 8 के पश्चात् भाग 9 जोड़कर उसमें अनुच्छेद 243 को समाविष्ट कर राज्य सरकारों को पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के लिए बाध्य कर दिया गया है। इसी के साथ उसके स्वरूप और विस्तार को भी स्पष्ट किया गया है, जिसके अनुसार ही व्यवस्था लागू किया जाना है। इस संशोधन के अन्य प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं—

  1. पूरे देश में ढाँचागत एकरूपता लाने के लिए त्रिस्तरीय गाँव, मध्यम (ब्लॉक) तथा जिला पंचायत व्यवस्था लागू की गई।
  2. कार्यकाल पाँच वर्ष का होगा। कार्यकाल समाप्ति के बाद ६  माह के भीतर चुनाव अनिवार्य होगा। इस व्यवस्था को नियमित एवं निष्पक्ष तथा सुचारु रूप से संचालित करने के लिए एक संवैधानिक संस्था राज्य निर्वाचन आयोग का प्रावधान किया गया है।
  3. सभी स्तरों पर पंचायत के सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा निर्वाचन से होगा। जनसंख्या के आधार पर समान अनुपात के अनुसार निर्वाचन क्षेत्र घोषित होगा।
  4. सभी स्तरों पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए उस क्षेत्र में उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीट आरक्षित होगी।
  5. महिलाओें के लिए भी सभी स्तरों की पंचायतों में कुल सीटों का एक तिहाई भाग आरक्षित होगा। यह व्यवस्था प्रधान/प्रमुख/अध्यक्ष के पद हेतु भी होगी।
  6. पिछड़े वर्गों के आरक्षण का मुद्दा राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ा गया है।
  7. संसाधनों की समुचित व्यवस्था हेतु वित्त आयोग का गठन तथा ऑडिट की समुचित व्यवस्था।
  8. ग्राम पंचायत स्तर से लेकर जिला स्तर तक जन भागीदारी के साथ योजना बनाने के लिए जिला योजना समिति के गठन का प्रावधान, इसी क्रम में 74वें संविधान संशोधन में किया गया है।
  9. ग्यारहवीं अनुसूची के माध्यम से विकास के 29 विभागों के कार्य पंचायतों के सुपुर्द किये गये।
  10. सभी स्तर की पंचायतों के चुनाव में भाग लेने हेतु प्रत्याशियों की एक निश्चित आयु सीमा 21 वर्ष का निर्धारण।
  11. ग्राम स्तर पर ग्राम सभा का गठन अनिवार्य होगा। ग्राम से संबंधित मतदाता सूची में पंजीकृत व्यक्तियों से मिलकर यह निकाय गठित होगा। इस बात का निर्देश है कि राज्य के विधानमण्डल द्वारा कानून बनाकर ग्राम सभाओं को अधिकार प्रदान किये जायेंगे।

इस प्रकार 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से कुछ इस तरह का प्रावधान किया गया जिससे पंचायती राज व्यवस्था को एक निश्चित एवं अधिकार-सम्पन्न अपनी सरकार के रूप में विकसित किया जा सके। आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य निश्चित किया गया।

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